संपादकीय लेखक निर्मित द्विवेदी गोपाल
बढ़ती बेरोजगारी, निजी शिक्षकों का शोषण और तानाशाही प्रबंधतंत्र: शिक्षा व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती
देश में बेरोजगारी आज केवल एक आर्थिक समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह सामाजिक और नैतिक संकट का रूप ले चुकी है। लाखों शिक्षित युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, लेकिन सीमित सरकारी नौकरियों और अनिश्चित भर्ती प्रक्रियाओं के कारण उन्हें अंततः निजी विद्यालयों और शिक्षण संस्थानों का रुख करना पड़ता है। दुर्भाग्य यह है कि वहां भी उन्हें सम्मानजनक वेतन, सुरक्षित कार्य वातावरण और श्रम के अनुरूप अधिकार नहीं मिल पाते।
निजी विद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में कार्यरत बड़ी संख्या में शिक्षक ऐसे हैं, जो भविष्य के नागरिकों का निर्माण तो कर रहे हैं, लेकिन स्वयं असुरक्षा और आर्थिक अभाव के बीच जीवन बिताने को मजबूर हैं। कई स्थानों पर योग्य और अनुभवी शिक्षकों को न्यूनतम वेतन से भी कम भुगतान किया जाता है। समय पर वेतन न मिलना, बिना कारण सेवा समाप्त कर देना, अतिरिक्त कार्य का दबाव, अवकाश से वंचित रखना और किसी भी प्रकार की आपत्ति उठाने पर नौकरी जाने का भय—ये समस्याएं अब अपवाद नहीं, बल्कि अनेक संस्थानों की कड़वी वास्तविकता बन चुकी हैं।
स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब कुछ निजी संस्थानों में प्रबंधतंत्र स्वयं को नियमों से ऊपर समझने लगता है। निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव, शिक्षकों की बात न सुनना, मनमाने आदेश लागू करना और असहमति जताने वालों पर कार्रवाई करना एक प्रकार की तानाशाही संस्कृति को जन्म देता है। शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में ऐसा वातावरण न केवल शिक्षकों का मनोबल तोड़ता है, बल्कि विद्यार्थियों की शिक्षा की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
यह स्वीकार करना होगा कि सभी निजी शिक्षण संस्थान ऐसे नहीं हैं। अनेक विद्यालय अपने शिक्षकों को उचित सम्मान, बेहतर वेतन और सुरक्षित कार्य वातावरण उपलब्ध कराते हैं। ऐसे संस्थान शिक्षा जगत के लिए प्रेरणा हैं। किंतु जहां शोषण और मनमानी का वातावरण है, वहां सुधार की आवश्यकता अब टाली नहीं जा सकती।
सरकार की जिम्मेदारी केवल सरकारी विद्यालयों तक सीमित नहीं हो सकती। निजी शिक्षण संस्थानों में कार्यरत शिक्षकों के लिए भी स्पष्ट सेवा नियम, न्यूनतम वेतन का प्रभावी अनुपालन, समय पर वेतन भुगतान, सामाजिक सुरक्षा और शिकायतों के निष्पक्ष समाधान की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। श्रम कानूनों और शिक्षा संबंधी नियमों का कठोरता से पालन कराया जाए, ताकि किसी भी शिक्षक का शोषण न हो सके।
समाज को भी यह समझना होगा कि शिक्षक केवल एक कर्मचारी नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की आधारशिला हैं। यदि वही आर्थिक असुरक्षा, मानसिक तनाव और प्रशासनिक उत्पीड़न से जूझेंगे, तो शिक्षा की गुणवत्ता पर इसका प्रभाव अवश्य पड़ेगा। एक सम्मानित और सुरक्षित शिक्षक ही आत्मविश्वास के साथ विद्यार्थियों को बेहतर भविष्य की दिशा दिखा सकता है।
बढ़ती बेरोजगारी और निजी शिक्षकों के शोषण का समाधान केवल रोजगार सृजन तक सीमित नहीं है। आवश्यकता ऐसी शिक्षा व्यवस्था की है, जहां योग्यता का सम्मान हो, श्रम का उचित मूल्य मिले और प्रबंधतंत्र अनुशासन तथा संवेदनशीलता के साथ कार्य करे। शिक्षा का उद्देश्य केवल संस्थान चलाना नहीं, बल्कि समाज का भविष्य गढ़ना है। यदि शिक्षक ही असुरक्षित रहेंगे, तो राष्ट्र के भविष्य को मजबूत बनाने का सपना भी अधूरा रह जाएगा।





