संपादकीय
कलम का सिपाही: एक पत्रकार की अनकही आत्मकथा
“जो दूसरों की आवाज़ बनता है, उसकी अपनी आवाज़ अक्सर भीड़ में खो जाती है।”
निर्मित द्विवेदी गोपाल की कलम
मैं पत्रकार हूँ।
मेरी पहचान किसी बड़े पद, महंगी गाड़ी या आलीशान दफ्तर से नहीं होती। मेरी पहचान उस कलम से है, जो सच लिखने का साहस रखती है; उस कैमरे से है, जो समाज का वास्तविक चेहरा दुनिया के सामने लाता है; और उस आवाज़ से है, जो हर उस व्यक्ति के लिए उठती है जिसकी पुकार सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुँच पाती।
लोग सुबह चाय की चुस्कियों के साथ अखबार पढ़ते हैं, मोबाइल पर खबरें देखते हैं और कुछ ही मिनटों में अगले विषय पर बढ़ जाते हैं। लेकिन शायद ही कोई सोचता है कि उन कुछ पंक्तियों के पीछे किसी पत्रकार की पूरी रात जागकर बिताई गई होगी, कई किलोमीटर की यात्रा होगी, भूख-प्यास होगी, धूप और बारिश होगी, और कभी-कभी अपनी जान का जोखिम भी होगा।
जब किसी सड़क पर खून बिखरा होता है, मैं वहाँ मौजूद होता हूँ। जब किसी माँ की चीख पूरे वातावरण को चीर रही होती है, मैं उस दर्द का साक्षी होता हूँ। जब किसी गरीब की झोपड़ी जलती है, जब कोई किसान अपनी उम्मीदों के साथ टूट जाता है, जब किसी बेटी के साथ अन्याय होता है—तब मैं केवल खबर नहीं लिखता, मैं समाज की अंतरात्मा को झकझोरने का प्रयास करता हूँ।
लेकिन मेरी अपनी पीड़ा… शायद ही कभी किसी को दिखाई देती है।
मैं भी एक बेटा हूँ, एक पिता हूँ, एक पति हूँ, एक भाई हूँ। मेरे भी सपने हैं, मेरी भी जिम्मेदारियाँ हैं। लेकिन हर बार जब कर्तव्य और परिवार के बीच चुनाव करना पड़ता है, मैं अक्सर कर्तव्य को चुनता हूँ। कितने ही त्योहार कैमरे के साथ बीत जाते हैं। बच्चों की मुस्कान, माता-पिता का स्नेह और परिवार का साथ—सब कुछ कई बार एक “ब्रेकिंग न्यूज़” के सामने छोटा पड़ जाता है।
विडंबना देखिए…
जब समाज में कुछ लोग पत्रकारिता की गरिमा को ठेस पहुँचाते हैं, तब पूरा पत्रकार समाज कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। कोई यह नहीं देखता कि देश के गाँवों, कस्बों और शहरों में हजारों पत्रकार आज भी बेहद सीमित संसाधनों में केवल जनहित के लिए काम कर रहे हैं। कई ऐसे भी हैं जिन्हें महीनों तक उचित पारिश्रमिक नहीं मिलता, फिर भी वे सच का साथ नहीं छोड़ते।
पत्रकारिता कोई व्यवसाय भर नहीं है; यह लोकतंत्र की धड़कन है। यदि न्यायपालिका न्याय की प्रहरी है, विधायिका कानून बनाती है और कार्यपालिका उन्हें लागू करती है, तो पत्रकारिता उन तीनों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाए रखने का नैतिक दायित्व निभाती है। इसलिए पत्रकार की कलम केवल शब्द नहीं लिखती, वह इतिहास दर्ज करती है।
हाँ, कभी-कभी डर भी लगता है।
धमकियाँ मिलती हैं। दबाव बनाया जाता है। विज्ञापन का लालच दिया जाता है। सच को दबाने की कोशिश होती है। चरित्र पर सवाल उठाए जाते हैं। लेकिन यदि पत्रकार डरकर चुप हो जाए, तो झूठ की आवाज़ सच से कहीं अधिक बुलंद हो जाएगी।
मैं जानता हूँ कि हर पत्रकार आदर्श नहीं होता। जैसे हर डॉक्टर, हर शिक्षक, हर वकील या हर नेता एक जैसा नहीं होता। कुछ गलत लोग किसी भी पेशे में हो सकते हैं। लेकिन कुछ लोगों की गलतियों से पूरी पत्रकारिता को कटघरे में खड़ा करना उन हजारों ईमानदार पत्रकारों के संघर्ष का अपमान है, जो अपनी कलम को बिकने नहीं देते।
मेरी सबसे बड़ी कमाई पुरस्कार नहीं है। मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि कोई सम्मान समारोह नहीं है। मेरी सबसे बड़ी जीत वह क्षण है जब मेरी खबर से किसी गरीब को न्याय मिलता है, किसी भ्रष्ट अधिकारी पर कार्रवाई होती है, किसी लापता बच्चे को उसका परिवार मिल जाता है, किसी अस्पताल की बदहाली सुधर जाती है, किसी गाँव तक सड़क पहुँच जाती है या किसी पीड़ित की आवाज़ शासन तक पहुँच जाती है।
यही मेरी असली पूँजी है।
हो सकता है कि मेरा नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज न हो। हो सकता है कि मेरी तस्वीर कभी किसी बड़े मंच पर न लगे। लेकिन यदि मेरी कलम ने किसी एक बेबस इंसान की आँखों में उम्मीद जगा दी, यदि मेरे शब्दों ने किसी अन्याय के खिलाफ समाज को खड़ा कर दिया, तो मेरा जीवन सार्थक है।
मैं पत्रकार हूँ…
मैं सत्ता से नहीं, सत्य से जुड़ा हूँ।
मैं भीड़ का हिस्सा नहीं, समाज का आईना हूँ।
मैं खबरें लिखता हूँ, लेकिन मेरी अपनी कहानी अक्सर अनछपी रह जाती है।
और शायद यही एक पत्रकार की सबसे बड़ी नियति है—दूसरों की आवाज़ बनते-बनते, अपनी आवाज़ को इतिहास की खामोशी में खो देना।




